Wednesday, November 01, 2017

तुम आने से पहले

तुम आने से पहले.....


तुम आने से पहले
चारों ओर अंधेरा सा था
ना कोई मंजिल ना रास्ता था
डर लग रहा था
कही लड़खड़ा न जाऊ
दर्द के इस घने अंधेरे में
कही घूम ना जाऊ
पर तुम आए रोशनी बनकर
प्यार भरा मौसम लेकर

तुम आने से पहले
आँखें दोनो सुक गई थी
सासें कहीं फूल गई थी
डर लग रहा था
कही डूब ना जाऊ
आसुओं के इस बाढ़ में
पर तुम आए किनारा बनकर
प्यार भरा मौसम लेकर

तुम आने से पहले
मन कही भटक गया था
दिल कही अटक गया था
डर लग रहा था
कही खो न जाउ
तपते रेगिस्तान में
कही जल ना जाउ
पर तुम आए बादल बनकर
प्यार भरा मौसम लेकर

तुम आने से पहले
जिंदगी बेरंग हुई थी
ना कोई हँसी, ना खुशी थी
डर लग रहा था
कही भावना दब न जाए
बेजान जिंदगी से
कही संवेदना खत्म ना हो जाए
पर तुम आए इंद्रधनुष बनकर
प्यार भरा मौसम लेकर

तुम आने से पहले
जीवन के राह में फिसल गई थी
दुख, दर्द में मसल गई थी
डर लग रहा था
कही डगमगा ना जाउ
दलदल के इस विशाल जाल में
कही फस ना जाउ
पर तुम आए सहारा बनकर
प्यार भरा मौसम लेकर

तुम आने से पहले
दुनिया से मैं छुप रही थी
खुदसे मैं भाग रही थी
डर लग रहा था
कही खुदको गवा ना दू
खुदके चेहरे से डरकर
आत्मसम्मान को ठेच पहुंचा न दू
पर तुम आए आयना बनकर
प्यार भरा मौसम लेकर


Every time I see you.....

Every time I see you
Just feel like seeing you..         

Every time I see you
I feel i am always near you..

Every time I see you
I feel lucky to have you

Every time I see you
I go happy and crazy for you

Every time I see you
I feel just to be with you

Every time I see you
I start caring for you

Every time I see you
Feel like kissing you

Every time I see you
I always feel for you

Every time I see you
I feel hour's talking to you

Every time I see you
I just feel sating ILU

Every time I see you
I feel so proud to find you

Every time I see you
I just want me and you

Every time I see you
I get closer and closer to you

Every time I see you
I newly start loving you

Every time I see you
I wish to marry you

Every time I see you
I owe me and my life for you......

यातना


रुईया कॉलेज मध्ये असताना एका कविते स्पर्धेत भाग घेतलेला..
तेव्हा आपण जी चिट्ठी निवडू त्यात असणारे 2 शब्द कवितेत आले पाहिजे असा नियम होता. मला आलेले शब्द होते पौर्णिमेचा चंद्र आणि ग्रहण, त्या प्रसंगी स्पर्धेत सुचलेली ही कविता. 

यातना

माझ्या आयुष्याला जणू ग्रहणच लागलंय
कधी असतो मी तो तर कधी होते ती
आयुष्यच माझं संपलंय तो-ती च्या चक्रव्यूहात
उमजेनास झालंय नक्की आहे तरी कोण मी?

कधी असतो मी पुल्लिंगी तर कधी मी स्त्रीलिंगी
हे सगळं कमी की काय म्हणून ठरवलं नपुसकलिंगी

एवढंच काय माझ्यासाठी आठवड्याचा एक दिवस ही ठेवला
पाची वापरून वाजणाऱ्या टाळ्यांचा प्रसार ही केला

प्रत्येक वेळी, प्रत्येक ठिकाणी माझा दुरावास केला
पौर्णिमेच्या शुभ्र चंद्राला काळा ग्रहण लागला

सगळीकडे प्रत्येकाने माझी नाचक्की केली
6 नंबर असल्याची नेम प्लेट माझ्या माथी लावली

नोकरी करायची म्हटली तरी तिथून माझी हकालपट्टी केली
2 रुपये द्या अशी भीक मागण्याची वेळ माझ्यावर आली

सगळ्यांसारखे दोन हात, दोन पाय देवाने मला ही दिले
मग का म्हणून पौर्णिमेच्या चंद्राला ग्रहण असे लागले?
का म्हणून पौर्णिमेच्या चंद्राला ग्रहण असे लागले?

नम्रता खैरे