Tuesday, October 31, 2017

प्यार नाचीज़ है


प्यार नाचीज़ है 

प्यार नाचीज़ है 
ये दिल कभी समझता नहीं 
समझता है 
पर संभलता नहीं 
 
अथला पानी में वो बार बार 
डुबकियाँ लगाना चाहता है 
नीचे पत्थरों को टकराकर 
खुदको चोट पहुँचाना चाहता है 

समझता है आगे एक दरिया है
फिर भी उसी में छलांग लगाना चाहता है 
हवा में तैरकर, थोड़ी ख़ुशी पाकर 
नीचे टकराना चाहता है 

अनजान हवा संग चलकर 
बर्फीली तूफानों में फसना चाहता है 
ठण्ड की सुनहरी धूप समझकर 
कड़ी धूप में जलना चाहता है 


झील का मीठा पानी समझकर 
समिंदर का पानी पीना चाहता है 
तपते रेगिस्तान में चलकर 
सराब की खोज पर निकलना चाहता है 

खुदको ही ना पहचानकर
प्यार की तलाश में भटकना चाहता है 
प्यार उसी के भीतर है ये भूलकर 
औरों को आखेटना चाहता है, औरों को आखेटना चाहता है 

प्यार नाचीज़ है 
ये दिल कभी समझता नहीं 
समझता है
पर संभलता नहीं ....................... 

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