Tuesday, October 31, 2017

मिलन

Embrace the nature..

मिलन

ये हवाएं गुनगुना रही है
ये फ़िज़ाएं मुस्कुरा रही है |
आघूश में भरकर ये
मानो मुझे गुदगुदा रही है ||

बंद आँखों के सामने खड़ी वो
पत्तों के आंचल से छु रही है
कानों के पास से गुजर रही है
मानो मेरा नाम पुकार रही है

लताओं का झुला बनाकर
वो झूल रही है
चुपके से देख रही है, शरमा रही है
मानो बरसों पुराना रिश्ता निभा रही है

झरने की तरह बरस रही है
अनघड़ पत्थरों को आकार दे रही है
में एक भटकता मुसाफिर
मानो मुझे वो राह दिखा रही है

जैसे नदी समुंदर में घुल रही है
चांदनी चांद को रिझा रही है
पत्तों को ओस भिगा रही है
मानो इसी तरह वो मुझे ललचा रही है

जैसे चातक बारिश में भीगने के लिए
मोर अपने पंख फैलाने के लिए
बादल मिटटी संग महकने के लिए
भवरा कली को चूमने के लिए
तरस रहे है,तड़प रहे है
एक दूजे के होने के लिए......

मानो उसी तरह वो बेताब है
मेरे और उसके मिलन के लिए.. मेरे और उसके मिलन के लिए .....

----- Namrata Khaire

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